पौध संरक्षण

निबौली सत् एक सस्ता घरेलू जैविक कीटनाशक

कृषि प्रधान देश भारत में दिनो  दिन बढ़ती आवादी का सीधा प्रभाव खाद्यान्न पर है। पिछले वषों में अनाज का उत्पादन तो बढ़ा है, परन्तु इसको सावधानी से संरक्षित न किया जाय तो इसमें घुन, कीड़े, सूड़ी व फंफूद लगने की सम्भावना बढ़ जाती है, तथा यह खाने व बीज योग्य नहीं रहता है खाद्यान्नों के भण्ड़ारण के लिए जो कीटनाशी या रसायन प्रयोग में लाये जाते हैं वे प्रायः जहरीले होते हैं जिसके कारण प्राणी जीव पर इसका विपरीत कुप्रभाव पड़ता है। इस प्रकार संरक्षित अनाज बिना धन खर्च किये मानव के लिए भी पौष्टिक एवं स्वास्थ्यवर्धक रहेगा। प्राणी जीव एवं खाद्यान्नों के भण्ड़ारण में नीम का उपयोग इस प्रकार है।

"पतली कमर पर ढुंगे पै चोटी कोन्या !! सै कुम्हारी पर कुम्हारों आली कोन्या !!"

असल में यह तो भीरड़-ततैयों वाले कुनबे की सै। अपना जापा काढण ताहि यह ततैया चिकनी मिटटी से छोटे-छोटे मटकों का निर्माण करती है। इसीलिए किसानों ने इसका नाम कुम्हारी रख लिया। वैसे तो इस ततैया की दुनिया भर में सैकड़ों प्रजातीय पाई जाती होंगी पर निडाना की कपास व् धान की फसल में तो अभी तक किसानों ने यही एक प्रजाति देखी है। यह कीट एकांकी जीवन जीने का आदि है मतलब समूह की बजाय अकेले-अकेले रहना पसंद करता है। काली, पीली व् गुलाबी छटाओं वाली इस ततैया की शारीरिक लम्बाई तकरीबन 15 -17  मी.मी.

खेत की तैयारी में छुपा है पौध संरक्षण

वर्ष में अधिकांश खेती का रकबा दो फसली फसल प्रणाली के तहत चलता है कुछ आंशिक क्षेत्र में जायद की फसलों को लगाकर अतिरिक्त आय के साधन की व्यवस्था की जाती है। फसल चाहे कोई भी हो खाद्यान्नों की हो अथवा उद्यानिकी सभी में कीट, रोगों का आक्रमण आम बात है और पौध संरक्षण में बचाव की भूमिका को यदि अधिक महत्व दिया जाये तो एक तीर से दो शिकार सम्भव हो सकेगा। एक तो पौध संरक्षण में कीट/ रोगों के उपचार पर होने वाले व्यय की बचत हो सकेगी। दूसरा कीटनाशकों के उपयोग से होने वाली पर्यावरण की हानि पर भी रोक लग सकेगी।

लाल मटकू - एक कीटनाशी बुग्ड़ा

कपास की फसल में कच्चे बीजों से तेल पीने वाला एक बदबूदार कीड़ा है लाल बनिया जिसका शिकार करने वाले कीड़े इस प्रकृति में बहुत कम हैं. इन्हीं में से एक कुशल शिकारी है यह लाल- मटकू जी हाँ! सरसरी तौर पर देखने से तो यह बुग्ड़ा भी लाल बनिये जैसा ही नजर आता है. आये भी क्यों नही? दोनों का वंशक्रम Heteroptera व् कुनबा Pyrrhocoridae एक ही जो ठहरा. कीट विज्ञानियों की बोली में इस लाल- मटकू का नाम है: Antilochus cocqueberti.माध्यम आकार के इस बुग्ड़े का रंग कहीं से लाल और कहीं से काला होता है पर ये दोनों रंग होते है खूब चटकीले. इसके शारीर की बनावट लम्बौत्रिय अंडाकार होती है.

Lal Matku

फेरोमोन ट्रैप: चना फली भेदक के प्रकोप के पूर्वज्ञान की विधि

चना फली भेदक चना की फसल को सर्वाधिक क्षति पहुँचाने वाला कीट है। यह चना की फसल में अक्टूबर ऐ मार्च तक पाया जाता है। अक्टूबर से दिसम्बर के महीनो में चना फली भेदक की सुंडी चना की पत्तियों को खाकर नुकसान पहुंचाती है। फरवरी से मार्च के महीनों में यह सुंडी चना की फलियों के दानो को खाकर फसल को क्षति पहुँचाती है। प्राय: किसान चना फलीभेदक का प्रकोप उस समय समझ पाते है जब सुंडी बड़ी होकर चना की फसल को 5-7 प्रतिशत तक नुकसान पहुंचा चुकी होती है। इसके फलस्वरूप इस अवस्था में चना फली भेदक की सुंडी को नियंत्रण कर पाना काफी कठिन एवं महंगा होता है जिससे किसानो को आर्थिक क्षति होती है।

Pheromon Trap

अग्नी अस्त्र

(तना कीट फलों में होने वाली सूंडी एवं इल्लियों के लिए)
 

सामग्री :-

1. 20 लीटर गोमूत्र
2. 5 किलोग्राम नीम के पत्ते की चटनी
3. आधा किलोग्राम तम्बाकू का पाउडर 
4. आधा किलोग्राम हरी तीखी मिर्च
5. 500 ग्राम देशी लहसुन की चटनी

बनाने की विधि :-

उपयुक्त ऊपर लिखी हुई सामग्री को एक मिट्टी के बर्तन में डालें और आग से चार बार उबाल आने दें। फिर 48 घंटे छाए में रखें। 48 घंटे में चार बार डंडे से चलाएं।

अवधि प्रयोग :-

ब्रम्हास्त्र

(अन्य कीट और बड़ी सूंडी इल्लियां)
 

सामग्री :-

1. 10 लीटर गोमूत्र
2. 3 किलोग्राम नीम की पत्ती की चटनी
3. 2 किलोग्राम करंज की पत्तों की चटनी
4. 2 किलोग्राम सीताफल पत्ते की चटनी
5. 2 किलोग्राम बेल के पत्ते
6. 2 किलोग्राम अंडी के पत्ते की चटनी
7. 2 किलोग्राम धतूरा के पत्ते की चटनी

बनाने की विधि :-

नीमास्त्र

(रस चूसने वाले कीट एवं छोटी सुंडी इल्लियां के नियंत्रण हेतु) सामग्री :-

1. 5 किलोग्राम नीम या टहनियां
2. 5 किलोग्राम नीम फल/नीम खरी
3. 5 लीटर गोमूत्र
4. 1 किलोग्राम गाय का गोबर

बनाने की विधि

सर्वप्रथम प्लास्टिक के बर्तन पर 5 किलोग्राम नीम की पत्तियों की चटनी, और 5 किलोग्राम नीम के फल पीस व कूट कर डालें एवं 5 लीटर गोमूत्र व 1 किलोग्राम गाय का गोबर डालें इन सभी सामग्री को डंडे से चलाकर जालीदार कपड़े से ढक दें। यह 48 घंटे में तैयार हो जाएगा। 48 घंटे में चार बार डंडे से चलाएं।

ट्राईकोग्रामा

यह गहरे रंग का अत्यन्त छोटा ततैया कीट होता है जो किलेपिडोप्टेरा कुल के लगभग 200 प्रकार के हानिकारक धान, सूर्यमुखी, कपास, फूलों और सब्जियों में हानिकारक तना छेदक, फल भेदक, पत्ती मोड़क कीटों का जैविक विधि से विनाश करता है।

नियंत्रण विधि

मादा ट्राईकोग्रामा फसल को क्षति पहुंचाने वाले कीटों के अण्डे में अपने अण्डे देती है। बाद में इन अण्डों से छोटे डिम्ब (लार्वा) निकलते हैं, जो कि हाानिकारक कीटों के अण्डों के भागों को खा जाते हैं। अंत में इन पोषित अण्डों से व्यस्क ट्राईकोग्रामा ततैया निकलता है। एक ट्राईकोग्रामा ततैया हानिकारक कीटों के 100 कीटों को मार देता है।

Triaichogaama, ट्राईकोग्रामा

जैविक नियंत्रण विधि के लाभ

इस विधि से परिस्थिति की एवं पर्यावरण की सुरक्षा होती है।
कीटनाशक एवं विषैले रसायनों से जल, वायु एवं भूमि की रक्षा होती है, साथ ही मनुष्य में होने वाले दुष्प्रभावों को कम करती है।
कीटों की प्रतिरोधिता एवं प्रजनन-क्षमता को कम करती है।
लाभदायक कीटों एवं मित्र कीटों को सुरक्षा प्रदान करती है।
विषरहित खाद्य पदार्थ उत्पादन प्राप्त होता है।
उत्पादन लागत में कमी होती है।
निर्यात में वृद्धि करने में सहायक।
कृषकों द्वारा ग्रामीण परिस्थिति में सुगमता से अपनाई जा सकती है।
कीटनाशकों से बढ़ती दुर्घटनाओं एवं स्वास्थ्य समस्याओं पर रोक लगती है।

Organic trap, जैविक नियंत्रण विधि के लाभ

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